Success Speaks
Realize Your Dream
राजस्थान के कश्मीर ‘माउंट आबू’ के पर्वतों के बीच मैंने सोचा कि अपने साथी युवाओं के लिए क्या लिखूं, उन्हें क्या बताऊं, फिर पहाड़ों की ऊंचाई ने मुझे इसका जवाब दे ही दिया कि मैं आपसे यह बात साझा करूं कि जिन्दगी में ऊंचाई पर जाने की तमन्ना हर किसी की होती है मगर क्या हम सभी अपने सपनों को हकीकत में बदल पाते हैं। जवाब सब जानते हैं - नहीं! आखिर ऐसा क्या भिन्न होता है उन दो अभ्यर्थियों में जिनके पास एक जैसी शिक्षा, समान पुस्तकें और अन्य भौतिक समरूपताएं होती हैं फिर भी उनमें से एक तो कामयाबी का स्वाद चख लेता है और दूसरा फिर से एक बार कसम खाता है कि इस बार परीक्षा का फार्म भरते ही पढूंगा। प्रायः ऐसे अभ्यर्थी अपनी नाकामयाबियों का बोझ रिश्वत, मीडियम और शहर-ग्रामीण के जालदार शब्दों पर डाल देते हैं। मित्रों, विश्वास करें कि यह जिन्दगी इतनी कीमती है कि आप इसके साथ यह परीक्षण नहीं कर सकते हैं कि अगली बार...सचमुच अगली बार! एक बार खुद को ईमानदारी से झोंक कर तो देखें अपने सपनों के पीछे, बिना किसी नकारात्मकता, पूर्वाग्रह या लीपापोती के। एक बार किसी दिन सुबह से शाम तक अपने सपने को अपने साथ-साथ चलाइए, उसका आनंद उठाइए और सोचिये कि आगे चार-पांच साल के बाद अगर आपको आपके सपने नहीं मिले तो आप क्या करेंगे उसके बिना। सारी जिन्दगी औरों के लिए तालियां बजाने के लिए थोड़ी जन्में हैं हम। अपने वजूद को साकार न कर पाने के मलाल के साथ गुमनामी के पन्नों में बहुत से लोग मर जाते हैं। हमें नहीं मरना है, हम अपने सपनों को सच करने के लिए अपनी तमाम क्षमताओं के साथ न्याय करेंगे। जब तक हम कामयाब नहीं हो जाते हैं तब तक हम केवल अपनी धुन में रहेंगे, अपने सपने के पीछे...हमारा संसार होगा हमारे सपने, हमारी किताबें और परिवेश में बिखरा ज्ञान। हम अगर ठोकर भी खायेंगे तो फिर उठेंगे, अड़े रहेंगे, डटे रहेंगे और एक दिन तालियों की करतल ध्वनियों के बीच हम देखेंगे अपने सपने को अपनी आँखों के सामने साकार होते और मुस्कुराते हुए।
ऊंचाई पर जाने की तमन्ना या तो करो ही मत और अगर कर लेते हो तो फिर संघर्ष के लिए तैयार रहो। मां शारदे का वरदहस्त न तो खिलंदड़ापन में मिलता है और ना ही कागजी तैयारी में। मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि कामयाबी का रिश्ता ना तो 13-14 घंटे की पढ़ाई से है और ना किताबों के ढेर से या चैक-जैक से। ये तो हारे हुए के लिए खुद की तसल्ली के साधन हैं। कामयाबी का सम्बन्ध तो उचित तैयारी के साथ है जो आपको किसी विषय वस्तु का विश्लेषण करना सीखा दे और अभिव्यक्त करने का सामथ्र्य दे दे। विनम्रता के साथ सीखने की सतत कोशिश और खुद पर भरोसा ही मेरी नज़र में सबसे बड़ी ताकत है। हार मत मानिए, लगे रहिये और बता दीजिये पूरी दुनिया को कि आपका जन्म निराश लोगों में खड़े रहने के लिए नहीं हुआ है, अपितु सफलता की नई इबारत रखने के लिए हुआ है।
आप तक मेरे ये शब्द ‘उत्कर्ष’ के माध्यम से पहुँच रहे हैं। ‘उत्कर्ष’ का तात्पर्य किसी के लिए एक ऐसे संस्थान से हो सकता है जो कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाता है मगर मैंने जितना ‘उत्कर्ष’ को समझा है और जाना है, उसके मुताबिक यह एक संस्था से कहीं ऊपर सचमुच एक जीवन अनुभव है जो ना केवल एक सामान्य परीक्षार्थी को एक गंभीर और सक्षम प्रतियोगी में बदल देता है बल्कि इसके साथ-साथ एक पारिवारिक स्नेहिल वातावरण भी देता है जो कि आपके अंदर की क्षमताओं और संभावनाओं को प्रस्फुटित कर देता है। इसके निदेशक निर्मल जी से मैंने सिर्फ यही सीखा है कि आप अपने आप को निर्मल बनाकर रखें - निर्मल सीखने के मामले में, जानने के मामले में और अभिव्यक्त करने में। शायद ज्यादा पंक्तियाँ मेरे भावों को कुछ भिन्नता ना प्रदान कर दें, इसीलिए इतना ही कहूँगा कि मुझे अच्छा लगता है जब में अपने आप को ‘उत्कर्ष’ से जुड़ा महसूस करता हूँ।
आखिर में आप सभी तैयारी करने वाले साथियों से सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि आम से ख़ास की तरफ बढि़ए, वर्ना जीते तो सभी हैं - वे भी जो कतार के सबसे पीछे हैं और वे भी, जो जहां खड़े होते हैं, कतार वहीं से शुरू होती है। चुनना आपके हाथ में है कि आप चंद कामयाब लोगों में श्ुामार होना चाहते हैं या उनमें जो अपने सपनों को सिसकते और दम तोड़ते हुए देखते हैं।
अंत में -
        ये नहीं कि हर जगह शुष्क जमीन ही मिले,
        जब चल पड़ा है प्यासा, तो दरिया जरूर आएगा।

     राजस्थान के कश्मीर ‘माउंट आबू’ के पर्वतों के बीच मैंने सोचा कि अपने साथी युवाओं के लिए क्या लिखूं, उन्हें क्या बताऊं, फिर पहाड़ों की ऊंचाई ने मुझे इसका जवाब दे ही दिया कि मैं आपसे यह बात साझा करूं कि जिन्दगी में ऊंचाई पर जाने की तमन्ना हर किसी की होती है मगर क्या हम सभी अपने सपनों को हकीकत में बदल पाते हैं। जवाब सब जानते हैं - नहीं! आखिर ऐसा क्या भिन्न होता है उन दो अभ्यर्थियों में जिनके पास एक जैसी शिक्षा, समान पुस्तकें और अन्य भौतिक समरूपताएं होती हैं फिर भी उनमें से एक तो कामयाबी का स्वाद चख लेता है और दूसरा फिर से एक बार कसम खाता है कि इस बार परीक्षा का फार्म भरते ही पढूंगा। प्रायः ऐसे अभ्यर्थी अपनी नाकामयाबियों का बोझ रिश्वत, मीडियम और शहर-ग्रामीण के जालदार शब्दों पर डाल देते हैं। मित्रों, विश्वास करें कि यह जिन्दगी इतनी कीमती है कि आप इसके साथ यह परीक्षण नहीं कर सकते हैं कि अगली बार...सचमुच अगली बार! एक बार खुद को ईमानदारी से झोंक कर तो देखें अपने सपनों के पीछे, बिना किसी नकारात्मकता, पूर्वाग्रह या लीपापोती के। एक बार किसी दिन सुबह से शाम तक अपने सपने को अपने साथ-साथ चलाइए, उसका आनंद उठाइए और सोचिये कि आगे चार-पांच साल के बाद अगर आपको आपके सपने नहीं मिले तो आप क्या करेंगे उसके बिना। सारी जिन्दगी औरों के लिए तालियां बजाने के लिए थोड़ी जन्में हैं हम। अपने वजूद को साकार न कर पाने के मलाल के साथ गुमनामी के पन्नों में बहुत से लोग मर जाते हैं। हमें नहीं मरना है, हम अपने सपनों को सच करने के लिए अपनी तमाम क्षमताओं के साथ न्याय करेंगे। जब तक हम कामयाब नहीं हो जाते हैं तब तक हम केवल अपनी धुन में रहेंगे, अपने सपने के पीछे...हमारा संसार होगा हमारे सपने, हमारी किताबें और परिवेश में बिखरा ज्ञान। हम अगर ठोकर भी खायेंगे तो फिर उठेंगे, अड़े रहेंगे, डटे रहेंगे और एक दिन तालियों की करतल ध्वनियों के बीच हम देखेंगे अपने सपने को अपनी आँखों के सामने साकार होते और मुस्कुराते हुए। ऊंचाई पर जाने की तमन्ना या तो करो ही मत और अगर कर लेते हो तो फिर संघर्ष के लिए तैयार रहो। मां शारदे का वरदहस्त न तो खिलंदड़ापन में मिलता है और ना ही कागजी तैयारी में। मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि कामयाबी का रिश्ता ना तो 13-14 घंटे की पढ़ाई से है और ना किताबों के ढेर से या चैक-जैक से। ये तो हारे हुए के लिए खुद की तसल्ली के साधन हैं। कामयाबी का सम्बन्ध तो उचित तैयारी के साथ है जो आपको किसी विषय वस्तु का विश्लेषण करना सीखा दे और अभिव्यक्त करने का सामथ्र्य दे दे। विनम्रता के साथ सीखने की सतत कोशिश और खुद पर भरोसा ही मेरी नज़र में सबसे बड़ी ताकत है। हार मत मानिए, लगे रहिये और बता दीजिये पूरी दुनिया को कि आपका जन्म निराश लोगों में खड़े रहने के लिए नहीं हुआ है, अपितु सफलता की नई इबारत रखने के लिए हुआ है।आप तक मेरे ये शब्द ‘उत्कर्ष’ के माध्यम से पहुँच रहे हैं। ‘उत्कर्ष’ का तात्पर्य किसी के लिए एक ऐसे संस्थान से हो सकता है जो कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाता है मगर मैंने जितना ‘उत्कर्ष’ को समझा है और जाना है, उसके मुताबिक यह एक संस्था से कहीं ऊपर सचमुच एक जीवन अनुभव है जो ना केवल एक सामान्य परीक्षार्थी को एक गंभीर और सक्षम प्रतियोगी में बदल देता है बल्कि इसके साथ-साथ एक पारिवारिक स्नेहिल वातावरण भी देता है जो कि आपके अंदर की क्षमताओं और संभावनाओं को प्रस्फुटित कर देता है। इसके निदेशक निर्मल जी से मैंने सिर्फ यही सीखा है कि आप अपने आप को निर्मल बनाकर रखें - निर्मल सीखने के मामले में, जानने के मामले में और अभिव्यक्त करने में। शायद ज्यादा पंक्तियाँ मेरे भावों को कुछ भिन्नता ना प्रदान कर दें, इसीलिए इतना ही कहूँगा कि मुझे अच्छा लगता है जब में अपने आप को ‘उत्कर्ष’ से जुड़ा महसूस करता हूँ।आखिर में आप सभी तैयारी करने वाले साथियों से सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि आम से ख़ास की तरफ बढि़ए, वर्ना जीते तो सभी हैं - वे भी जो कतार के सबसे पीछे हैं और वे भी, जो जहां खड़े होते हैं, कतार वहीं से शुरू होती है। चुनना आपके हाथ में है कि आप चंद कामयाब लोगों में श्ुामार होना चाहते हैं या उनमें जो अपने सपनों को सिसकते और दम तोड़ते हुए देखते हैं। अंत में -

ये नहीं कि हर जगह शुष्क जमीन ही मिले,

जब चल पड़ा है प्यासा, तो दरिया जरूर आएगा।